प्रांगण में एक दोपहर

ज़ोंगकर छोएदे का हर घंटा औपचारिक अध्ययन या अनुष्ठान से भरा नहीं रहता।

कक्षाओं के बाद विहार का प्रांगण एक बिलकुल अलग जगह बन सकता है। युवा भिक्षु आपस में बातें करते हैं, छोटे-मोटे काम निपटाते हैं, जो सीखा है उसका अभ्यास करते हैं — और समय मिलने पर, बस खेलते हैं।

एक गेंद निकल आती है। कोई दौड़ने लगता है। कोई गंभीर बातचीत हँसी में घुल जाती है।

मठीय जीवन के बारे में सोचते समय ऐसे दृश्य सहज ही छूट जाते हैं। हमारे मन में प्रायः प्रार्थना भवन, ग्रंथ और अनुष्ठान आते हैं। ये सब महत्वपूर्ण हैं, किंतु विहार एक ऐसा समुदाय भी है जिसमें लोग बड़े होते हैं, काम करते हैं, सीखते हैं, मित्रताएँ बनाते हैं और साधारण क्षण साझा करते हैं।

ज़ोंगकर छोएदे में दिन के अनेक घंटों की पहचान शास्त्रार्थ और पाठ की ध्वनि से होती होगी।

किंतु कभी-कभी प्रांगण के आर-पार गूँजती ध्वनि केवल हँसी होती है।

यह विवरण एक प्रारूप है, जो विहार की समीक्षा की प्रतीक्षा में है।